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Ashtavakra Gita kaise bani ?

राजा जनक और अष्टावक्र

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प्राचीन भारत में मिथिला के राजा जनक के नाम से प्रसिद्ध एक धर्मात्मा राजा थे। वे बहुत ज्ञानी और साधु प्रवृत्ति के थे। उन्हें सत्य की खोज थी और वे सच्चे ज्ञान की प्राप्ति के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। एक दिन उन्होंने घोषणा की कि जो भी उन्हें ब्रह्मज्ञान का सच्चा अर्थ समझा देगा, उसे वे अपना गुरु बना लेंगे।

राजा जनक की इस घोषणा को सुनकर कई विद्वान, ऋषि-मुनि और साधु उनके दरबार में पहुँचे, लेकिन कोई भी राजा जनक की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सका। तब एक दिन अष्टावक्र नामक एक युवा ऋषि वहाँ पहुँचे। अष्टावक्र का शरीर विकृत था, उनकी आठ अंग टेढ़े-मेढ़े थे, इसलिए उनका नाम अष्टावक्र पड़ा।

जब अष्टावक्र दरबार में प्रवेश कर रहे थे, तो दरबारियों ने उनके विकृत शरीर को देखकर उनका मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। अष्टावक्र ने इस पर कुछ नहीं कहा और सीधे राजा जनक के पास पहुँचे। राजा जनक ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया और उन्हें बैठने के लिए स्थान दिया।

अष्टावक्र ने राजा जनक से पूछा, "राजन, आप किस खोज में हैं?"

राजा जनक ने उत्तर दिया, "मुझे ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति करनी है।"

अष्टावक्र ने कहा , "यदि आपको ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना है तो चमारो को क्यों बुलाया है?"

अष्टावक्र की सुनकर सारी सभा स्तब्ध हो गई। एक दरबारी ने उठ कहा, "हे मुर्ख ब्राह्मण बालक क्या तुम जानते हो की तुम कहा खड़े हो ?और क्या कह रहे हो?, ये महा ज्ञानी राजा जनक की सभा है। यहाँ बड़े बड़े ज्ञानी अपना शीश जुकाते है। यहाँ बैठा हुआ व्यक्ति वर्षो तक तप साधना कर के ज्ञान अर्जित किया है, और तुम उन्हें चमार कह रहे हो?"

अष्टावक्र ने कहा, " चमार न कहु तो क्या कहु ? मेरे बाह्य शरीर को देखा कर आप सब हसने लगे। क्या आप में से किसी मेरी आत्मा को जाना ? क्या मेरे अंदर जो ज्ञान है उसको जानने करी ? चमारो की भांति केवल मेरे बाहरी देखावे को देखकर आप सभी हसने लगे। हे राजन, आपकी सभा तो चमारो से भरी है, फिर आपको ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति कैसे होंग ?"


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अष्टावक्र की बात सुनकर राजा जनक अपने सिंघासन से उठ खड़े हुए, उन्होंने अष्टावक्र के चरणों में अपना मुकुट रखकर बड़े ही विनम्र भाव से पूछा, " हे भगवंत आप बड़े ही ज्ञानी मालूम पड़ता है। मुख में जो तेज है वह कही और नहीं। कृपा मुझे आत्मज्ञान प्रदान करे।

राजा जनक की विम्रता देख अष्टावक्र ने मुस्कुराते हुए कहा, "राजन, ज्ञान पाने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि यह शरीर नहीं, आत्मा है। शरीर का विकृत होना या सुंदर होना मायने नहीं रखता। सच्चा ज्ञान आत्मा का ज्ञान है, जो न विकृत होता है और न ही बदलता है।"

यह सुनकर राजा जनक को सच्चे ज्ञान का बोध हुआ। उन्होंने महसूस किया कि वे सिर्फ शरीर नहीं हैं, बल्कि एक शुद्ध आत्मा हैं। राजा जनक ने अष्टावक्र को अपना गुरु मान लिया और उनसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया। उसी ज्ञान को आगे जाकर अष्टावक्र गीता के नाम से प्रसिद्ध हुई।

आगे जाकर राजा जनक 'विदेही'कहलाए।

सच्चा ज्ञान शरीर की सुंदरता या विकृति पर निर्भर नहीं करता। आत्मा का ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है, जो हमें सच्चाई का बोध कराता है और जीवन के सही अर्थ को समझने में मदद करता है।

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